Saturday, April 18, 2026
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2000′ साल पुरानी ममी का हुआ` CT, स्कैन वैज्ञानिकों को मिला असली इंसानी दर्द और बीमारियों का सबूत

जरा सोचिए, क्या हम आज के आधुनिक युग में बैठकर 2000 साल पहले जी रहे किसी इंसान के दर्द, उसकी बीमारी और उम्र का सटीक पता लगा सकते हैं? सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे सच कर दिखाया है. हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया (USC) के रिसर्चर ने दो प्राचीन मिस्र की ममियों का CT स्कैन किया. जब इन ममियों को स्कैनिंग मशीन के अंदर डाला गया, तो जो तस्वीरें निकलकर सामने आईं, उन्होंने विशेषज्ञों के होश उड़ा दिए. पट्टियों के पीछे छिपे उन इंसानी शरीरों ने हजारों सालों बाद अपनी खामोशी तोड़ी और बताया कि प्राचीन काल में भी इंसान वैसी ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते थे जैसे हालात आज हैं. आइए जानते हैं नेस-मिन और नेस-होर नाम की इन दो ममियों के सीने में दफन वो राज, जिन्हें जानकर आप भी दंग रह जाएंगे.

पट्टियों के पीछे छिपा दर्द
फोर्ब्स की रिपोर्ट के अनुसार, स्कैन की गई पहली ममी ‘नेस-मिन’ की थी, जिसकी मृत्यु करीब 330 ईसा पूर्व में 40 की उम्र के आसपास हुई थी. स्कैन में उसके शरीर के अंदर रीढ़ की हड्डी के टूटने और पसलियों में फ्रैक्चर के निशान मिले. लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात कुछ और थी. शोधकर्ताओं को नेस-मिन के शरीर पर कुछ ऐसे सुराख और निशान मिले जो प्राकृतिक नहीं लग रहे थे. इमेजिंग विभाग की प्रमुख समर डेकर का मानना है कि ये निशान किसी प्राचीन ‘सर्जिकल इंटरवेंशन’ यानी सर्जरी की कोशिश के हो सकते हैं. दूसरी तरफ, ‘नेस-होर’ नाम की ममी, जिसकी मौत करीब 190 ईसा पूर्व में 60 वर्ष की आयु में हुई थी, उसके दांतों में गंभीर समस्या पाई गई थी. इसका मतलब है कि हजारों साल पहले भी लोग बुढ़ापे और जोड़ों के दर्द से बेहाल थे.

बिना पट्टियां खोले कैसे दिखे अंदरूनी राज?
इन ममियों के रहस्यों को जानने के लिए वैज्ञानिकों ने उन्हें छुआ तक नहीं. इसके लिए एक बेहद शक्तिशाली ‘320-स्लाइस CT स्कैनर’ का इस्तेमाल किया गया, जो 0.5 मिलीमीटर जितनी महीन और सटीक तस्वीरें ले सकता है. मजा तो इस बात का है कि इन ममियों को उनके ताबूतों (Sarcophagi) के निचले हिस्सों से निकाला भी नहीं गया और मशीन ने उनके शरीर का पूरा 3D डिजिटल मॉडल तैयार कर दिया. यह तकनीक बिल्कुल वैसी ही है जैसे किसी जीते-जागते इंसान का अस्पताल में टेस्ट किया जाता है. इस ‘वर्चुअल ऑटोप्सी’ की मदद से वैज्ञानिक अब उन ममियों के कंकाल, उनके अंगों की बनावट और उनके शरीर में मौजूद प्राचीन धातुओं या ताबीजों को बिना किसी नुकसान के देख पा रहे हैं.

आपस में छिड़ी बहस
जहां एक तरफ विज्ञान इस खोज का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ नैतिकता (Ethics) पर सवाल भी उठ रहे हैं. डरहम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर क्रिस्टीना रिग्स का कहाना है कि प्राचीन मिस्र में शवों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया (Mummification) एक पवित्र और गुप्त स्थान थी, जिसे ‘अनंत काल’ के लिए गुप्त रखने के उद्देश्य से बनाया गया था. उनके अनुसार, इन शरीरों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना या स्कैन करना उन प्राचीन मान्यताओं का अपमान हो सकता है. प्रोफेसर रिग्स का मानना है कि कोई भी तकनीक पूरी तरह से ‘सम्मानजनक’ नहीं हो सकती अगर वह उस व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उसकी निजता का हनन करती है. यह बहस अब पूरी दुनिया में छिड़ गई है कि विज्ञान की जिज्ञासा बड़ी है या पूर्वजों की आस्था.

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